(राग कल्यान)
प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट। [1]
बेकारयौं दै जान कहावत, जानिपन्यौं की कहा परी बाट? [2]
काहू कौ सर सूधौ न परै, मारत गाल गली-गली हाट। [3]
कहिं श्रीहरिदास जानि ठाकुर-बिहारी तकत ओट पाट॥ [4]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (18)
प्रेम-समुद्र रूप-रस गहरे, कैसैं लागैं घाट। [1]
बेकारयौं दै जान कहावत, जानिपन्यौं की कहा परी बाट? [2]
काहू कौ सर सूधौ न परै, मारत गाल गली-गली हाट। [3]
कहिं श्रीहरिदास जानि ठाकुर-बिहारी तकत ओट पाट॥ [4]
- ललिता अवतार श्री हरिदास जी, अष्टादश पद (18)
जिस प्रकार समुद्र की अगाधता का कोई ओर-छोर नहीं है, उसी प्रकार प्रेम-सागर, जिसमें केवल रूप और रस की गहराई है, उसका ओर-छोर कोई कैसे पा सकता है? कोई भी इसके किनारे तक नहीं पहुँच सकता। [1]
जो यह कहते हैं कि मैंने 'प्रेम-तत्त्व' को जान लिया है, वे सब बेकार की बातें कर रहे हैं। यह प्रेम-तत्त्व वह मार्ग नहीं है जिसे पार किया जा सके। जो वास्तविक प्रेम के रसिक होते हैं, वे अंततः यही कहते हैं कि मैं तो कुछ जानता ही नहीं। [2]
जो गली-गली, हाट-हाट गाल बजाकर डोलते फिरते हैं और प्रेम की चर्चा एवं प्रदर्शन करते हैं, उनका कोई भी तीर अभी लक्ष्य पर नहीं लगा है। वास्तव में वे ‘विशुद्ध-प्रेम’ से अभी कोसों दूर हैं। [3]
रसिक-अनन्य-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज कहते हैं कि श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज सब बातों को भली-भाँति जानते हैं, क्योंकि वे हृदय के पर्दे के भीतर बैठकर सब कुछ देख रहे हैं। [4]
जो यह कहते हैं कि मैंने 'प्रेम-तत्त्व' को जान लिया है, वे सब बेकार की बातें कर रहे हैं। यह प्रेम-तत्त्व वह मार्ग नहीं है जिसे पार किया जा सके। जो वास्तविक प्रेम के रसिक होते हैं, वे अंततः यही कहते हैं कि मैं तो कुछ जानता ही नहीं। [2]
जो गली-गली, हाट-हाट गाल बजाकर डोलते फिरते हैं और प्रेम की चर्चा एवं प्रदर्शन करते हैं, उनका कोई भी तीर अभी लक्ष्य पर नहीं लगा है। वास्तव में वे ‘विशुद्ध-प्रेम’ से अभी कोसों दूर हैं। [3]
रसिक-अनन्य-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज कहते हैं कि श्रीबाँकेबिहारीजी महाराज सब बातों को भली-भाँति जानते हैं, क्योंकि वे हृदय के पर्दे के भीतर बैठकर सब कुछ देख रहे हैं। [4]

