कुंज बिहारिनि लाडिली - श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 1 (18)

कुंज बिहारिनि लाडिली - श्री भगवत रसिक जी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 1 (18)

कुंज बिहारिनि लाडिली, कुंजबिहारी लाल।
भगवत रसिक ह्रदय बसत, गौर स्याँम की माल॥

- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकाभरण ग्रंथ 1 (18)

श्री भगवत रसिक कहते हैं कि रसिकों की यह गौर-श्यामल वर्ण वाली जुगल जोड़ी अर्थात् श्री राधा–कृष्ण सदैव मेरे हृदय में विराजमान रहते हैं।