अहो तेमी कुञ्जास्तदनुपम रासस्थलमिदं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (209)

अहो तेमी कुञ्जास्तदनुपम रासस्थलमिदं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (209)

अहो तेमी कुञ्जास्तदनुपम रासस्थलमिदं, गिरिद्रोणी सैव स्फुरति रति-रंङ्गे-प्रणयिनी।
न वीक्षे श्रीराधां हर-हर कुतोपीति शतधाविदीर्येन्त प्राणेश्वरि मम कदा हन्त हृदयम्॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (209)

अहो ! बड़े आश्चर्य की बात है ! यह सब वही कुंजें ! वही अनुपम रासस्थल तथा रति-रङ्ग-प्रणयिनी गिरि ( गोवर्धन ) गुहाएँ हैं !! किन्तु हाय ! हाय !! बड़ा खेद है कि श्रीराधा कहीं नहीं दीखतीं ! हे प्राणेश्वरि ! ऐसा होने पर मेरा हृदय कब शतधा (शत खण्ड) होकर विदीर्ण हो जायेगा?