और ठौर जो जतन करै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (55)

और ठौर जो जतन करै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (55)

और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं।
ह्यां फिरै स्वारथ आपने, भजन गहे फिरै बाँहि॥

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृंदावन शत लीला (55)

श्री वृन्दावन से अन्यत्र बहुत प्रयत्न करने पर भी भजन सहज नहीं होता; पर यहाँ तो कोई निज स्वार्थवश भी विचरण करे, तो भजन स्वयं उसे पकड़े रहता है।