बैठे दोउ कुञ्जन में बलहारी।
नन्द कुँवर अलबेलो नागर श्री वृषभानु दुलारी॥ [1]
सूँघत सौरभ लिए कमलकर, रतिरस प्रीतम प्यारी।
जै श्री भट्ट गौर साँवर मुख लखि सखियाँ सब वारी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य
वृंदावन के कुंज महल में विराजमान श्री राधा कृष्ण अति मनमोहक श्रंगार से सजे हैं, उनकी इस छवि पर बलिहारी है। [1]
वे एक-दूसरे को परस्पर निहारते हुए प्रेम के दिव्य रंग में डूबते जा रहे हैं। कमल के पुष्प की मंद-मंद सुगन्ध से पूरा वातावरण सुगन्धित हो रहा है। दोनों अपने हाथों में कमल के पुष्प की मीठी सुगन्ध को सूंघ रहे हैं और यह दिव्य सुगन्ध उनके प्रेम को और बढ़ा रहा है।
निकुंज में जुगल किशोर की सेवा में उपस्थित सभी साखियाँ अति प्रसन्न हैं। श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं, "वे सभी गौर वर्ण श्री राधा एवं श्याम वर्ण श्री कृष्ण पर स्वयं को न्योछावर कर रही हैं।" [2]
नन्द कुँवर अलबेलो नागर श्री वृषभानु दुलारी॥ [1]
सूँघत सौरभ लिए कमलकर, रतिरस प्रीतम प्यारी।
जै श्री भट्ट गौर साँवर मुख लखि सखियाँ सब वारी॥ [2]
- श्री भट्ट देवाचार्य
वृंदावन के कुंज महल में विराजमान श्री राधा कृष्ण अति मनमोहक श्रंगार से सजे हैं, उनकी इस छवि पर बलिहारी है। [1]
वे एक-दूसरे को परस्पर निहारते हुए प्रेम के दिव्य रंग में डूबते जा रहे हैं। कमल के पुष्प की मंद-मंद सुगन्ध से पूरा वातावरण सुगन्धित हो रहा है। दोनों अपने हाथों में कमल के पुष्प की मीठी सुगन्ध को सूंघ रहे हैं और यह दिव्य सुगन्ध उनके प्रेम को और बढ़ा रहा है।
निकुंज में जुगल किशोर की सेवा में उपस्थित सभी साखियाँ अति प्रसन्न हैं। श्री भट्ट देवाचार्य कहते हैं, "वे सभी गौर वर्ण श्री राधा एवं श्याम वर्ण श्री कृष्ण पर स्वयं को न्योछावर कर रही हैं।" [2]

