किं करोम्यहमुन्मत्तो यत् किंचत प्रलपाम्यलम्।
ज्ञान-भक्ति-विरक्त्यादि व्यार्थं वृन्दावनं विना॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.33)
क्या करूँ? मैं तो पागल हो गया हूँ। जो कुछ प्रलाप करता हूँ- उससे ही क्या होगा? श्रीवृन्दावन के (आश्रय) बिना ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि सब व्यर्थ हैं।
ज्ञान-भक्ति-विरक्त्यादि व्यार्थं वृन्दावनं विना॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (4.33)
क्या करूँ? मैं तो पागल हो गया हूँ। जो कुछ प्रलाप करता हूँ- उससे ही क्या होगा? श्रीवृन्दावन के (आश्रय) बिना ज्ञान, भक्ति, वैराग्य आदि सब व्यर्थ हैं।

