धन-धन वृन्दावन यह नाउं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (4)

धन-धन वृन्दावन यह नाउं - श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (4)

धन - धन वृन्दावन यह नाउं।
सब तत्त्वनि को सार-सार सुख परम पियारो ठाउं॥ [1]
सोवत सुपनै नित निसबासुर, याही को नित गाउं।
नागरिया जाकैं मुख प्रगटैं ता मुख की बलि जाउं॥ [2]

- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (4)

श्री वृंदावन धाम धन्य धन्य है। यह श्री वृंदावन धाम समस्त तत्वों का सार ही नहीं अपितु प्रेम रस का भी सार है। [1]
जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति की अवस्था में भी मैं नित्य श्री वृंदावन धाम का यश गाऊँगा। श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "जिसके भी मुख से श्री वृंदावन धाम के यश का गान हो रहा है, मैं उस मुख पर बलिहार जाता हूँ।" [2]