जोगी ज्ञानी कर्मठी - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित बिहारी जुगल ध्यान (128)

जोगी ज्ञानी कर्मठी - श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित बिहारी जुगल ध्यान (128)

जोगी ज्ञानी कर्मठी, तपसिन ते अति दूर।
नागर रसिक अनन्य नित, रहत नैंन भरपूर॥

- श्री भगवत रसिक जी, श्री भागवत रसिक जी की वाणी, श्री नित बिहारी जुगल ध्यान (128)

अनन्य रसिकों का मार्ग योगियों, ज्ञानियों, कर्मठों और तपस्वियों के मार्ग से अत्यन्त भिन्न और दूर होता है। अनन्य रसिकों के नयनों में तो नित्य ही भरपूर रूप से श्री राधा–कृष्ण समाए रहते हैं।