(सवैया)
श्री वृषभानु सुता पद पंकज मेरी, सदां यह जीवन मूर है। [1]
याही के नाम सो ध्यान रहै, नित जाकें रटे जग कंटक दूर हैं॥ [2]
श्रीवनराज निवास दियो, जिन और दियो सुख हू भरपूर है। [3]
याकौं बिसार जो औरै भजौं, 'बलबीर' जू जानिये तौ मुख धूर है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद,श्रीराधा शतक (74)
वृषभानु नन्दिनी श्री राधा जू के चरण-कमल ही सदा मेरे प्राण-धन हैं। [1]
मेरे मन में नित्य केवल श्रीराधा के नाम का ही ध्यान रहता है, जिससे संसार के सभी कांटे और विघ्न दूर हो जाते हैं। [2]
श्रीराधाजू ने ही मुझे श्रीवृंदावन धाम का अमूल्य वास दिया है और सभी सुखों का सार, अपने चरणों की भक्ति, प्रदान की है। [3]
श्रीलाल बलबीर कहते हैं—“जो जीव ऐसी परम करुणामयी किशोरी जी को भूलकर किसी और का भजन करता है, उस जीव के मुख में धूल पड़ेगी; धिक्कार है उसके जीवन को।” [4]
श्री वृषभानु सुता पद पंकज मेरी, सदां यह जीवन मूर है। [1]
याही के नाम सो ध्यान रहै, नित जाकें रटे जग कंटक दूर हैं॥ [2]
श्रीवनराज निवास दियो, जिन और दियो सुख हू भरपूर है। [3]
याकौं बिसार जो औरै भजौं, 'बलबीर' जू जानिये तौ मुख धूर है॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद,श्रीराधा शतक (74)
वृषभानु नन्दिनी श्री राधा जू के चरण-कमल ही सदा मेरे प्राण-धन हैं। [1]
मेरे मन में नित्य केवल श्रीराधा के नाम का ही ध्यान रहता है, जिससे संसार के सभी कांटे और विघ्न दूर हो जाते हैं। [2]
श्रीराधाजू ने ही मुझे श्रीवृंदावन धाम का अमूल्य वास दिया है और सभी सुखों का सार, अपने चरणों की भक्ति, प्रदान की है। [3]
श्रीलाल बलबीर कहते हैं—“जो जीव ऐसी परम करुणामयी किशोरी जी को भूलकर किसी और का भजन करता है, उस जीव के मुख में धूल पड़ेगी; धिक्कार है उसके जीवन को।” [4]

