यघपि सब औगुन भर्यौ, तदपि करत तुव ईठ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसे दीजै पीठ॥
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसे दीजै पीठ॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (57)
यद्यपि मैं सब अवगुणों का भंडार हूँ, फिर भी हे हितस्वरूप वृन्दावन! आपके स्वभाव को जानते हुए मैं आपका त्याग कैसे कर दूँ? आपको पीठ दिखाकर किसी अन्य स्थान पर कैसे चला जाऊँ?

