(राग मलार)
ललित लतानि तरैं नान्हीं-नान्हीं बूँदै परैं,
भींजत रँगीले दोऊ प्रीतम प्यारी॥ [1]
हँसि-हँसि बातैं करैं भुज-मूल अंस धरैं,
लाग्यौ पीत-पट तन सुरँग कसूँभी सारी॥ [2]
विवि वदननि छवि रही कछु फुँहीं फबि,
उपमा न जात कछू मन में विचारी॥ [3]
रसिक उभय उदार गावत राग मलार,
'हित ध्रुव' सुनि तान देत प्रान वारी॥ [4]
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, पद्यावली (73)
वृन्दावन की ललित लताओं के नीचे जहाँ पावस की झींनी-झींनी बूँदे बरस रही हैं, रँग-रँगीले प्रिया-प्रियतम (युगल) खड़े भींग रहे हैं। [1]
वे गलबहियाँ दिए हुए हँसते-मुस्कुराते वार्ता कर रहे हैं। वर्षा की बूँदों से भींगे हुए उनके वस्त्र पीताम्बर एवं कसूँभी साड़ी अङ्गों से लिपटे हुए हैं। [2]
युगल के मुखारविन्दों की छवि वर्षा की फुहारों से कुछ ऐसी विलक्षण दर्शित हो रही है जिसके लिए मेरे मन में कोई उपमा स्फुरित ही नहीं हो पा रही है। [3]
उदार रसिक युगल मलार राग का समवेत स्वर में गान कर रहे हैं। श्री हित धुवदास इस तान का श्रवण करके अपने प्राणों को न्यौछावर कर रहे हैं। [4]
ललित लतानि तरैं नान्हीं-नान्हीं बूँदै परैं,
भींजत रँगीले दोऊ प्रीतम प्यारी॥ [1]
हँसि-हँसि बातैं करैं भुज-मूल अंस धरैं,
लाग्यौ पीत-पट तन सुरँग कसूँभी सारी॥ [2]
विवि वदननि छवि रही कछु फुँहीं फबि,
उपमा न जात कछू मन में विचारी॥ [3]
रसिक उभय उदार गावत राग मलार,
'हित ध्रुव' सुनि तान देत प्रान वारी॥ [4]
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, पद्यावली (73)
वृन्दावन की ललित लताओं के नीचे जहाँ पावस की झींनी-झींनी बूँदे बरस रही हैं, रँग-रँगीले प्रिया-प्रियतम (युगल) खड़े भींग रहे हैं। [1]
वे गलबहियाँ दिए हुए हँसते-मुस्कुराते वार्ता कर रहे हैं। वर्षा की बूँदों से भींगे हुए उनके वस्त्र पीताम्बर एवं कसूँभी साड़ी अङ्गों से लिपटे हुए हैं। [2]
युगल के मुखारविन्दों की छवि वर्षा की फुहारों से कुछ ऐसी विलक्षण दर्शित हो रही है जिसके लिए मेरे मन में कोई उपमा स्फुरित ही नहीं हो पा रही है। [3]
उदार रसिक युगल मलार राग का समवेत स्वर में गान कर रहे हैं। श्री हित धुवदास इस तान का श्रवण करके अपने प्राणों को न्यौछावर कर रहे हैं। [4]

