जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)

जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)

(दोहा)
पराभक्ति रति वर्ध्दिनी, स्यामा सब सुख दैनि।
रसिक मुकुटमनि राधिके, जय नव नीरज नैनि॥

(पद)
जयति जय राधा रसिक मनि मुकुट मनि हरनी त्रिये।
पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये॥ [1]
जयति गोरी नव किसोरी सकल सुख सीमा श्रिये।
पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये॥ [2]
जयति रति रस वर्ध्दिनी अति अद्भुता सदया हिये।
पराभक्ति प्रदायिनी करि कृपा करुणा निधि प्रिये॥ [3]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (52)

संध्या आारती के पश्चात् सखी प्रेम रुपा श्रीप्रियाजू से "पराभक्ति" प्राप्ति के लिए प्रार्थना कर रही हैं।

(दोहा)
समस्त सुखों को प्रदान करने वाली और पराभक्ति में अनुराग को बढ़ाने वाली, नवीन कमल-दल के समान नेत्रों वाली, उन श्यामा श्रीराधारानी की जय हो, जो रसिक-लाल श्री कृष्ण के मुकुट की मणि अर्थात् उनके शिरोभूषण स्वरूपा हैं।

(पद)
रसिक मुकटमणि लाल के भी मन को हरण करने वाली प्रिये, श्रीराधा रानी की जय हो। आप ही "पराभक्ति" प्रदान करने वाली हैं। [1]

हे करूणा की सागर प्रिये मुझ दीन पर कृपा करें। सब सुखों की सीमा स्वरूप लक्ष्मी नव किशोरी गौराँगी जी की जय हो। [2]

रति रस को बढ़ाने वाली अद्भुत प्रकार की दया हृदय में धारण करने वाली की जय हो। [3]