प्रिया कहा करें मन बस नाँही - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (59)

प्रिया कहा करें मन बस नाँही - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (59)

प्रिया कहा करें मन बस नाँही। [1]
करनी कछू बनै नहिं मोपै मन बच क्रम सब अवगांही॥ [2]
एक उपाय एही है स्वामिनि अपनी जानि गहो बांही। [3]
श्रीहरिदास रसिक अनन्य बिन और ठौर हमकों नाँही॥ [4]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (59)

हे प्राणप्यारी श्री लाड़िली जू, अब मैं क्या करूं, किसी भी प्रकार से मेरा मन बस में नहीं आता है। [1]
मन-वचन-कर्म समस्त प्रकार से मैंने प्रयास करके देख लिया परंतु सब उपाय मुझ पर निष्फल हो जाते हैं। [2]
अब बस एक यही उपाय है की हे स्वामिनी जू, आप मुझे अपना जान कर मेरा हाथ नित्य पकड़ लीजिए। [3]
इसके अतिरिक्त और कोई भी उपाय शेष नहीं रह गया है क्योंकि रसिक अनन्य श्री स्वामी हरिदास जू की शरण के बिना मेरी कोई दूसरी गति नहीं है। [4]