मोहन लाल के रंग राँची - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्रीहित स्फुट वाणी (12)

मोहन लाल के रंग राँची - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्रीहित स्फुट वाणी (12)

(राग बिलावल एवं धनाश्री)
मोहन लाल के रंग राँची।
मेरे ख्याल परौ जिनि कोऊ, बात दसौं दिसि माँची॥ [1]
कंत अनंत करौ जो कोऊ, बात कहौं सुनि साँची।
यह जिय जाहु भलैं सिर ऊपर, हौंऽव प्रगट ह्वै नाँची॥ [2]
जागत शयन रहत उर ऊपर, मनि कंचन ज्यौं पाँची।
(जै श्री) हित हरिवंश डरौं काके डर, हौं नाहिन मति काँची॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्रीहित स्फुट वाणी (12)

प्रस्तुत पद में सखि भावापन्न श्री हित हरिवंश जी कहते हैं कि मैं मोहन लाल के रंग में रँगी हुई हूँ।अथवा मोहन लाल जिस रंग में रँगे हैं उसी श्री श्यामा जू के रंग में मैं भी रंगी हुई हूँ। मेरे चित्त में अब किसी अन्य के लिये स्थान नहीं है, और यह बात अब सर्वत्र विख्यात हो चुकी है, किसी से छिपी नहीं है। [1]

कोई कितने भी पति करले तात्पर्य किसी की प्रियता संसार में कितनी भी जगह बटी रहे किन्तु मेरी प्रियता तो केवल श्री राधा प्राणनाथ मोहन लाल के प्रति है, मैं यह सत्य-सत्य अपने हृदय की बात कहती हूँ। उनके प्रेम में भले ही मेरे प्राण चले जायें, मुझे शिरोधार्य है और इस बात को मैं अतिशय आनन्दपूर्वक सबके सम्मुख स्वीकार करती हूँ। [2]

जागते-सोते प्रत्येक अवस्था में मेरा हृदय इन्द्रनीलमणि श्याम एवं कंचन तनी श्यामा से मणि कंचनवत् जटित रहता है। श्रीहित हरिवंश जी कहते हैं अब मुझे किसी से भी डरने की आवश्यकता नहीं क्योंकि मेरी बुद्धि कच्ची नहीं है अपितु भली भाँति परिपक्व, स्थिर और सुदृढ़ है। [3]