भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोक कृष्णार्जुनाद्याः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (227)

भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोक कृष्णार्जुनाद्याः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (227)

भोः श्रीदामन्सुबल वृषभस्तोक कृष्णार्जुनाद्याः, किंवो दृष्टं मम नु चकिता दृग्गता नैव कुञ्जे।
काचिद्देवी सकल भुवनाप्लाविलावण्यपूरादूरादेवाखिलमहरत प्रेयसो वस्तु सख्युः॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (227)

[श्यामसुन्दर ने कहा]"हे श्रीदाम, सुबल, वृषभ, स्तोक-कृष्ण, अर्जुन आदि सखाओ ! तुमने क्या देखा? मेरी चकित दृष्टि ने कुञ्ज में प्रवेश न करने पर भी जो देखा है, उसे सुनो-अपने सौन्दर्य्य-प्रवाह से निखिल-भुवन को डुबा देने वाली एक अवर्णनीय देवी ने दूर से ही अपने प्रिय सखा मुझ श्रीकृष्ण की अखिल वस्तुओं का अपहरण कर लिया है।"