परसाद विहारिनि रानी कौ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (63)

परसाद विहारिनि रानी कौ - श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (63)

(राग गौरी)
परसाद विहारिनि रानी कौ।
अति आनंद बढै छिन ही छिन महा प्रेम सुखदानी कौ॥ [1]
जाकी सोभा कहत न आवै अद्भुत रूप निमानी कौ।
श्रीललितकिसोरी लाडलडावति अति जाननि मन जानी कौ॥ [2]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (63)

नित्य विहारीणी श्री राधे जू का नित्य विहार रूपी दिव्य प्रसाद छिन छिन आनंद पूर्वक है, एवं महाप्रेम सुख का दान करने वाला है। [1]
इस प्रसाद की शोभा अद्भुत एवं अनिर्वचनिय है। श्री ललित किशोरी जी कहते हैं कि मेरे मन को जानने वाली श्री किशोरी जी के कृपा प्रसाद के बल से ही वह लाड़ली लाल को मनमानी लाड़ लड़ाते हैं। [2]