भूमिलोक सुरलोक सब, रहे पताल लजाय।
कुमरि माधुरी अंग की, समता दीजे काय॥
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, नख सिख दर्शन (4)
कुमरि माधुरी अंग की, समता दीजे काय॥
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, नख सिख दर्शन (4)
श्री राधा की रूप-अंग माधुरी के सामने भू-लोक, सुर-लोक और पाताल-लोक का समस्त सौन्दर्य तुच्छ प्रतीत होता है।

