अब तो कृपा करो श्री राधा।
वृन्दाविपुन बसौं श्रीस्वामिनि छांड़ि जगत की बाधा॥ [1]
तीन लोक गावत वा बन की लीला ललित अगाधा।
नागरिया पैं तनक ढरे तें होय सहज सुख साधा॥ [2]
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (96)
हे श्रीराधा, अब तो कृपा कर दीजिए। संसार के बंधन को छुड़ाकर मुझे वृंदावन का वास प्रदान कर दीजिए। [1]
तीनों लोक वृंदावन धाम की ललित लीलाओं का गान कर रहे हैं। श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "हे श्री राधा, आपकी कृपा की कोर हो जाए तो सहज ही प्रेम सुख प्राप्त हो जाए।" [2]
वृन्दाविपुन बसौं श्रीस्वामिनि छांड़ि जगत की बाधा॥ [1]
तीन लोक गावत वा बन की लीला ललित अगाधा।
नागरिया पैं तनक ढरे तें होय सहज सुख साधा॥ [2]
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (96)
हे श्रीराधा, अब तो कृपा कर दीजिए। संसार के बंधन को छुड़ाकर मुझे वृंदावन का वास प्रदान कर दीजिए। [1]
तीनों लोक वृंदावन धाम की ललित लीलाओं का गान कर रहे हैं। श्री नागरीदास जी कह रहे हैं "हे श्री राधा, आपकी कृपा की कोर हो जाए तो सहज ही प्रेम सुख प्राप्त हो जाए।" [2]

