वृषभानु लली गुन गाइये।
उनकेइ चरण कमल कहँ ध्यावत, आठों याम गमाइये॥ [1]
उनकेइ नाम लेत निशिवासर, अँसुवन धार बहाइये।
उनकेइ नित्यधाम बरसाने, पुनि पुनि आइय जाइये॥ [2]
उनकेइ परम पवित्र चरित कहँ, सुनिये और सुनाइये।
उनकेइ जो ‘कृपालु’ जन उन ते, प्रेम सुधा रस पाइये॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (45)
भावार्थ - अरे मन ! वृषभानुनन्दिनी के गुण गाओ | उनके ही चरण - कमलों का निरन्तर ध्यान करो | [1]
उनके ही नाम का निरन्तर गान करते हए आँसुओं की धारा बहाओ | उनके ही बरसाने धाम में बार - बार आया जाया करो | [2]
उनके ही परम पवित्र चरित्र को सुनो और सुनाओ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जो उनके रसिक हैं, प्रेमामृत उन्हीं से प्राप्त हो सकेगा | [3]
उनकेइ चरण कमल कहँ ध्यावत, आठों याम गमाइये॥ [1]
उनकेइ नाम लेत निशिवासर, अँसुवन धार बहाइये।
उनकेइ नित्यधाम बरसाने, पुनि पुनि आइय जाइये॥ [2]
उनकेइ परम पवित्र चरित कहँ, सुनिये और सुनाइये।
उनकेइ जो ‘कृपालु’ जन उन ते, प्रेम सुधा रस पाइये॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्री राधा माधुरी (45)
भावार्थ - अरे मन ! वृषभानुनन्दिनी के गुण गाओ | उनके ही चरण - कमलों का निरन्तर ध्यान करो | [1]
उनके ही नाम का निरन्तर गान करते हए आँसुओं की धारा बहाओ | उनके ही बरसाने धाम में बार - बार आया जाया करो | [2]
उनके ही परम पवित्र चरित्र को सुनो और सुनाओ | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि जो उनके रसिक हैं, प्रेमामृत उन्हीं से प्राप्त हो सकेगा | [3]

