ऐसैंई देखत रहौं जनम सुफल करि मानौं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (3)

ऐसैंई देखत रहौं जनम सुफल करि मानौं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (3)

(राग कान्हरौ)
ऐसैंई देखत रहौं जनम सुफल करि मानौं। [1]
प्यारे की भाँवती भाँवती के प्यारे जुगल किशोर जानौं॥ [2]
छिनु न टरौ पल होहु न इत उत रहौ एक तानौं। [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा कुंजबिहारी मन रानौं॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (3)

सुन्दर निकुंज महल में पियप्यारी गलबाँहीं दिये विराजित हैं। दोनों ने पुष्पों के आभूषण धारण कर रखे हैं। आनन्द रस सागर में बिहार कर रहे हैं। सखीगण हर्षित हो रही हैं।
ललिता हरिदासी सखी, सखी से कह रही हैं - हे सखी ! रसमत्त पिय प्यारी तन मन से एक हो परस्पर कंधे से कंधा मिला नित नवीन मनोरथों के अनुसार विलस रहे हैं ऐसे अद्भुत सुख को हम देखते रहें, हमारा जन्म सफल हो गया मानो। [1]
प्यारे की भाँवती प्रिया जी एवं भाँवती के प्यारे बिहारी जी एक दूसरे की रुचि अनुसार भाँति भाँति से केलि विलास कर रहे हैं। [2]
आखिरकार ये हैं कौन? इन्हें युगलकिशोर ही समझो, ये एक क्षण भी विछुड़ते नहीं ऐसा ही मैं जानती हूँ, सखी कह रही रही है। युगल किशोर क्यों परस्पर ये कंधों पर बाहें धरे यानि गलबाँहीं दिये बिहार करते हैं। अद्भुत महारस में मगन ये एक पल भी नहीं टलते, अलग नहीं होते, नित्य एक दूसरे के सन्मुख अंग से अंग जुड़े एक मति हो बिहार करते हैं, इधर उधर नहीं होते । [3]
श्री हरिदासी सखी के स्वामी श्यामा कुंजबिहारी नित्य एक रस एक मन विचार हो बिहार करते है। इनके नित्य बिहार ही आहार हैं। प्यारी जी अपने मन की राजा हैं, मनमौजी हैं, गर्वीली, सुकुमारी हैं। लाल रस के लोभी दीन बने उन पर आसक्त हैं । अत: उन्हें डर रहता है कि प्यारी जी मान न कर बैठे। अत: यह नित्यविहार अनवरत चले। इसमें बाधा न पड़े और हम सखीगण इसे निहारते रहें। [4]