वृन्दाबन साँचौ धन भैया।
कनक कूट कौटिक लगि तजिए, भजिये कुँवर कन्हैयाँ॥ [1]
जहाँ श्री राधा चरनरेनु की कमला लेत बलैय्या।
तिन को गोपी नाच नचावत, मोहन वेणु बजैया॥ [2]
कामधेनु के छीर सिन्धु तजि भजहु नन्द की गैय्या।
चार्यों मुक्ती कहा ले करिहों जहाँ यसौदा मैय्या॥ [3]
अद्भुत लीला, अद्भुत वैभव शत् शुकदेव कहईया।
'व्यास' दास पुकारत वनते थौरे लोग सुनइया॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (192)
"हे मेरे भाई, श्री वृंदावन धाम ही एकमात्र सच्चा धन है। इसलिए सोने के उन ढेरों को छोड़ दो और श्रीकृष्ण का भजन करो। [1]
श्री वृन्दावन में लक्ष्मीजी श्री राधाजी के चरण रज की पूजा करती हैं; उन्ही ब्रज रेणू में गोपियों का नृत्य होता है और मनमोहन श्री कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं। [2]
समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय को छोड़ नन्दनन्दन श्री कृष्ण की गायों की पूजा करें ! माता यशोदा के महल मे निवास को छोड़ कर चार प्रकार की मुक्ति भी प्राप्त हो जाए तो क्या? [3]
वृन्दावन में श्री कृष्ण की अती अद्भुत लीलाएँ अनवरत चल रही हैं, जहाँ का वैभव भी अद्भुत है। श्री हरिराम व्यास अब कहते हैं, "वृन्दावन से श्री कृष्ण समस्त जीवों को पुकार रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही उसे सुन पाते हैं!" [4]
कनक कूट कौटिक लगि तजिए, भजिये कुँवर कन्हैयाँ॥ [1]
जहाँ श्री राधा चरनरेनु की कमला लेत बलैय्या।
तिन को गोपी नाच नचावत, मोहन वेणु बजैया॥ [2]
कामधेनु के छीर सिन्धु तजि भजहु नन्द की गैय्या।
चार्यों मुक्ती कहा ले करिहों जहाँ यसौदा मैय्या॥ [3]
अद्भुत लीला, अद्भुत वैभव शत् शुकदेव कहईया।
'व्यास' दास पुकारत वनते थौरे लोग सुनइया॥ [4]
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, पूर्वार्ध (192)
"हे मेरे भाई, श्री वृंदावन धाम ही एकमात्र सच्चा धन है। इसलिए सोने के उन ढेरों को छोड़ दो और श्रीकृष्ण का भजन करो। [1]
श्री वृन्दावन में लक्ष्मीजी श्री राधाजी के चरण रज की पूजा करती हैं; उन्ही ब्रज रेणू में गोपियों का नृत्य होता है और मनमोहन श्री कृष्ण बाँसुरी बजाते हैं। [2]
समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली कामधेनु गाय को छोड़ नन्दनन्दन श्री कृष्ण की गायों की पूजा करें ! माता यशोदा के महल मे निवास को छोड़ कर चार प्रकार की मुक्ति भी प्राप्त हो जाए तो क्या? [3]
वृन्दावन में श्री कृष्ण की अती अद्भुत लीलाएँ अनवरत चल रही हैं, जहाँ का वैभव भी अद्भुत है। श्री हरिराम व्यास अब कहते हैं, "वृन्दावन से श्री कृष्ण समस्त जीवों को पुकार रहे हैं, लेकिन बहुत कम लोग ही उसे सुन पाते हैं!" [4]

