न मे भूयान्मोक्षो न पुनरमराधीश सदनं न योगो न ज्ञानं न विषस सखं दुःखकदनम्॥
त्वदुच्छिष्टं भोज्यं तब पदजलं पेयमपि तद्रजोमूर्ध्नि स्वामिन्यनुभव नमस्तु प्रतिभवम्॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (8)
मुझे न तो मुक्ति की इच्छा है और न ही भगवान कृष्ण के दिव्य लोकों की। मैं न तो योग के फल की इच्छा रखता हूँ, न ज्ञान की और न ही इंद्रियों के क्षणभंगुर सुखों की। हे राधे, मैं केवल आपके उच्छिष्टामृत और चरणामृत की कामना करता हूँ और इच्छा करता हूं कि प्रत्येक क्षण आपकी चरण रज मेरे सिर पर विराजमान हो।
त्वदुच्छिष्टं भोज्यं तब पदजलं पेयमपि तद्रजोमूर्ध्नि स्वामिन्यनुभव नमस्तु प्रतिभवम्॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (8)
मुझे न तो मुक्ति की इच्छा है और न ही भगवान कृष्ण के दिव्य लोकों की। मैं न तो योग के फल की इच्छा रखता हूँ, न ज्ञान की और न ही इंद्रियों के क्षणभंगुर सुखों की। हे राधे, मैं केवल आपके उच्छिष्टामृत और चरणामृत की कामना करता हूँ और इच्छा करता हूं कि प्रत्येक क्षण आपकी चरण रज मेरे सिर पर विराजमान हो।

