रसिक रँगे जे जुगल रँग, तिनकी जूँठनि खाइ।
जहाँ तहाँ के पावने, भजन तेज घटि जाइ॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (28)
जो रसिक भक्त श्री युगल किशोर श्यामा-श्याम के प्रेम-रंग में रँगे हुए हैं, उन्हीं का उच्छिष्ट-प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। मनमुखी रीति से जहाँ-तहाँ खाने-पीने से भजन का प्रभाव क्षीण हो जाता है।
जहाँ तहाँ के पावने, भजन तेज घटि जाइ॥
- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, मन शिक्षा लीला (28)
जो रसिक भक्त श्री युगल किशोर श्यामा-श्याम के प्रेम-रंग में रँगे हुए हैं, उन्हीं का उच्छिष्ट-प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। मनमुखी रीति से जहाँ-तहाँ खाने-पीने से भजन का प्रभाव क्षीण हो जाता है।

