कुसुम सेज पिय प्यारी पौढे करत है रस बतियाँ - श्री हरिराय जी

कुसुम सेज पिय प्यारी पौढे करत है रस बतियाँ - श्री हरिराय जी

(राग केदारो)
कुसुम सेज पिय प्यारी पौढे करत है रस बतियाँ। [1]
हँसत परस्पर आनंद हुलसत लटक लटक लपटात छतियाँ॥ [2]
अतिरस रंगभीने रीझे री रिझवार
एक तनमन भई एकमति गतियाँ। [3]
रसिक सुजान निर्भय क्रीड़त दोऊ
अंग अंग प्रति विंबित दोऊन के बसन भतियाँ॥ [4]

- श्री हरिराय जी

प्रिया प्रियतम श्री राधा कृष्ण फूलों की सेज पर पौढ़े हुए रस वार्ता कर रहे हैं। [1]
प्रेम रस वार्ता करते करते कभी प्रिया प्रियतम हर्षित होते हैं तो कभी हंसने लगते हैं तो कभी एक दूसरे का आलिंगन करते हैं। [2]
दोनों के तन, मन, प्राण एवं गति एक है और दोनों प्रेम रस में भींज रहे हैं। [3]
श्री हरिराय जी कह रहे हैं “दोनों रसिक शिरोमणि निर्भय होकर ब्रज में क्रीड़ा कर रहे हैं और इनकी छवि ऐसी है जैसे दोनों एक दूसरे के प्रतिबिंब हैं।” [4]