श्रीमद्भागवत के अनुसार, जब कंस के आदेशानुसार अक्रूर जी श्री कृष्ण एवं श्री बलराम जी को रथ में बिठाकर वृन्दावन से मथुरा ला रहे थे, तब उन्होंने अपने रथ को यमुना जी की किनारे रोक दिया। श्री कृष्ण-बलराम जी को रथ पर छोड़ कर उन्होंने स्नान, संध्या आदि करने के लिए यमुना जी में प्रवेश किया। तो अक्रूर जी ने स्नान करते समय श्री यमुना जी में श्री कृष्ण बलराम जी के दर्शन भगवान विष्णु शेषसैयां पर विरजमानित रूप में किए । बाद में यही स्थान श्री अक्रूर घाट के नाम से जाने जाना लगा। इसी स्थान पर वृन्दावन वासियों ने वैकुण्ठ के ग्रहों का दर्शन किया था।
इसी स्थान पर, जब श्री चैतन्य महाप्रभु वाराणसी से वृन्दावन आए तो उन्होंने इसे ही अपना रात्रि विश्राम का स्थान बनाया। दिन में वे इमलीतला पर बैठ कर हरिनाम करते थे। तब वृन्दावन में चारो तरफ केवल वन ही वन थे। अक्रूर घाट के सामने सुरभि गाय के दर्शन है तथा उसी के पास श्री चैतन्य महप्रभु के चरण कमल चिन्ह हैं। निकट ही एक बरगद का वृक्ष (पेड़) है, जिसके बारे में कहा जाता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहां विश्राम किया था।
वर्तमान में अक्रूर घाट पर कृष्ण और बलराम के साथ अक्रूर जी का मंदिर है।
इसी स्थान पर, जब श्री चैतन्य महाप्रभु वाराणसी से वृन्दावन आए तो उन्होंने इसे ही अपना रात्रि विश्राम का स्थान बनाया। दिन में वे इमलीतला पर बैठ कर हरिनाम करते थे। तब वृन्दावन में चारो तरफ केवल वन ही वन थे। अक्रूर घाट के सामने सुरभि गाय के दर्शन है तथा उसी के पास श्री चैतन्य महप्रभु के चरण कमल चिन्ह हैं। निकट ही एक बरगद का वृक्ष (पेड़) है, जिसके बारे में कहा जाता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहां विश्राम किया था।
वर्तमान में अक्रूर घाट पर कृष्ण और बलराम के साथ अक्रूर जी का मंदिर है।

