नित्यं कामः किमपि कुरुते दुसहां मर्मपीड़ा-मान्ध्यं क्रोधः किमपि कुरुते क्षोभयेल्लोभः उच्चैः।
दम्भसूया-मद पिशुनता-मत्सराद्यैः सुपूर्णः स्वार्थदभ्रष्टस्तदिह शरणं यामि वृन्दावन! त्वाम्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.4)
हे श्रीवृन्दावन! काम, कैसी कैसी असह मर्म-पीड़ा नित्य देता है, क्रोध, कितना अन्धा कर देता है, लोभ भी अत्यन्त क्षुभित करता है और दम्भ, असूया, मद, पिशुनता, मात्सर्य आदि से लिप्त मैं स्वार्थ से भ्रष्ट हुआ अब आपकी ही शरण लेता हूँ।
दम्भसूया-मद पिशुनता-मत्सराद्यैः सुपूर्णः स्वार्थदभ्रष्टस्तदिह शरणं यामि वृन्दावन! त्वाम्॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.4)
हे श्रीवृन्दावन! काम, कैसी कैसी असह मर्म-पीड़ा नित्य देता है, क्रोध, कितना अन्धा कर देता है, लोभ भी अत्यन्त क्षुभित करता है और दम्भ, असूया, मद, पिशुनता, मात्सर्य आदि से लिप्त मैं स्वार्थ से भ्रष्ट हुआ अब आपकी ही शरण लेता हूँ।

