ब्रह्म लोक पर्यंत सुख, अरु मुक्तिहुँ सुख त्याग।
तबै धरहु पग प्रेम पथ, नहिं लगि जैहैं दाग॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (45)
ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुखों की कामना तथा पाँचों मुक्तियों की अभिलाषा का त्याग करके ही विशुद्ध भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहिए; अन्यथा प्रेम के उज्ज्वल स्वरूप पर कामनाओं का काला धब्बा लग जाएगा।
तबै धरहु पग प्रेम पथ, नहिं लगि जैहैं दाग॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (45)
ब्रह्मलोक पर्यन्त के सुखों की कामना तथा पाँचों मुक्तियों की अभिलाषा का त्याग करके ही विशुद्ध भक्ति-सरिता में अवगाहन करना चाहिए; अन्यथा प्रेम के उज्ज्वल स्वरूप पर कामनाओं का काला धब्बा लग जाएगा।

