लाड़िली-लाल बिलास करैं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रंगार शत लीला (3.5)

लाड़िली-लाल बिलास करैं - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रंगार शत लीला (3.5)

लाड़िली-लाल बिलास करैं, रचि सेज सुदेस सुरंग सुहाई। [1]
मंदहि-मंद हँसैं रस-मत्त, भरे अनुराग महा छबि पाई॥ [2]
कोक-कलानि की घातनि माहिं, बिचित्र बिनोद बढ़ावत माई। [3]
सखी चहुँ कोद लतानि लगीं, निरखैं ‘ध्रुव’ प्राननिं देति बधाई॥ [4]

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रंगार शत लीला (3.5)

श्री लाड़िली लाल जी सुन्दर सुहावनी रँगमगी शय्या पर विलास परायण हैं। [1]
अनुराग पूरित रसोन्मत्त युगल, मन्द मधुर हास परिहास करते हुए अपूर्व शोभा को प्राप्त हो रहे हैं। [2]
वे ललित कोक-कलाओं के घात- परिघातों से विलक्षण प्रकार के विनोदों की वृद्धि कर रहे हैं। [3]
श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि लता-भवन के गवाक्षों से लगी सखियाँ इस रसद-केलि का दर्शन करके अपने प्राण बलिहार करती हुई बधाई देती हैं। [4]