केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, राधा शतक (110)

केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं - श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, राधा शतक (110)

(कवित्त)
केकी जो बनावै तौ बनैयौ बनराज जू कौं,
कूक कूक नाच नाच सुजस सुनाऊँ मैं। [1]
लता द्रुम बेली रंगरेली जो करौ तौ करौ,
रावरे ही अंगन पै पुष्प-झर लाऊँ मैं॥ [2]
जो पै रज-रेनुका बनावौ मन भायौ ये ही,
तौ पै पद पंकजन सीस पै धराऊँ मैं। [3]
ये ही बर पाऊँ ललचाऊँ सुख साधे राधे,
बास दे निकुंजन को तेरौ ही कहाऊँ मैं॥ [4]

- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, राधा शतक (110)

श्री लाल बलबीर श्री राधारानी से कहते हैं, "यदि आप मुझे मयूर ही बनाना चाहें तो श्री वृंदावन धाम का ही बनाइए, जिससे मैं कूक कर और नाच कर आपका यश ही आपको सुनाऊँ।" [1]

यदि आप मुझे लता, द्रुम, या बेली बनाना चाहें, तो अपने आंगन का ही बनाइए, जहाँ नित्य लीला होती है, जिससे मैं आपको प्रसन्न करने के लिए आंगन में पुष्प बरसा सकूँ। [2]

यदि आपका मन भाए कि आप मुझे रज कण ही बनाना चाहें, तो भी आप अपने पद पंकज की ही रज बनाएँ, जिससे आपके चरण कमल नित्य ही मेरे शीश पर रहें। [3]

श्री लाल बलबीर कहते हैं, "मैं यही वर पाना चाहता हूँ कि मैं आपके सुख के लिए नित्य ही ललचाया करूँ, आप मुझे निकुंज में ही नित्य वास दें, चाहे किसी भी रूप में, और हे राधे, मैं केवल और केवल आपका ही कहलाऊँ।" [4]