तुव जस कोटि ब्रह्मांड बिराजै राधे  - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (41)

तुव जस कोटि ब्रह्मांड बिराजै राधे - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (41)

॥राग केदारौ॥
तुव जस कोटि ब्रह्मांड बिराजै राधे । [1]
श्री सोभा बरनी ने जाय अगाधे ॥ [2]
बहुतक जनम बिचारत ही गये साधे साधे । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
ए दिन मैं क्रम क्रम करि लाधे ॥ [4]

- श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (41)

भावार्थ:
प्यारी को अति प्रसन्न देख प्यारे जी कह रहे हैं - हे राधे, आपका यश प्रताप कोटि - कोटि ब्रह्मांड में विराज रहा है । [1]
आपसे प्रेम करने वाले नेही जन यह गुणगान कर रहे हैं कि आप अपने स्नेही प्रिय श्याम की सभी इच्छाओं मनोरथों को पूर्ण कर रही हैं । श्री राधे की अपूर्व सुंदर छवि , जो प्रसन्नता, कृपा से परिपूर्ण है, की शोभा अवर्णनीय है । [2]
मुझमें इस अथाह, अपार शोभा की वर्णन करने की क्षमता कहाँ ? आपकी रुपमाधुरी का पान करते - करते मैं ध्यान में तदाकार भाव मे डूब जाता हूँ, समाधि अवस्था में पहुँच जाता हूँ । आपकी रुचि का ध्यान करते महाव्याकुल ही साधना में कई जन्म बिता दिये । [3]
श्री हरिदास के स्वामी श्याम कह रहे हैं - हे श्यामा ! बहुत जन्म आपकी रुचि अनुसार विनती की, आप की कृपा होने पर मुझे हृदय से आपने लगाया । आपकी कृपा दुर्लभ है परंतु आपने मुझपर कृपा की तथा मेरे लिए इसे सुलभ बनाया । [4]