धन - धन वृन्दावन जो आवैं । [1]
सुन्दर करत प्रीति सन्तन सौं, नित प्रति न्यौंत जिमावैं ॥ [2]
मन - वच - क्रम सौं सेवत साधन, चरननि लगि लपटावैं । [3]
नागरीदास भाग तिनको कोउ, कहाँ लगि वरन सुनावैं ॥ [4]
- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), वन जन प्रशंसा (45)
भावार्थ:
वह जीव धन्य है जो श्री वृन्दावन धाम से जुड़ा है, नित्य रसिक संतो का आदर सम्मान करता हुआ उनसे प्रेम करता है। [1 & 2]
मन - वचन - कर्म से साधन भजन करता हुआ उनके चरणों में लिपटा रहता है। [3]
श्री नागरीदास जी कहते है की उनके भाग्य का वर्णन भला कैसे हो सकता है ? ( अर्थात् उनके भाग्य का वर्णन नहीं किया जा सकता ।) [4]
मन - वचन - कर्म से साधन भजन करता हुआ उनके चरणों में लिपटा रहता है। [3]
श्री नागरीदास जी कहते है की उनके भाग्य का वर्णन भला कैसे हो सकता है ? ( अर्थात् उनके भाग्य का वर्णन नहीं किया जा सकता ।) [4]

