कीजै रंगमहल की दासी - श्री रूप सखी, रूप सखी जी की वाणी

कीजै रंगमहल की दासी - श्री रूप सखी, रूप सखी जी की वाणी

(राग विहागरौ)
कीजै रंगमहल की दासी। [1]
स्यामा स्याम केलि अवलोकौं श्रीहरिदासी पासी।। [2]
बिबिध बिहार सार सुख सजनी बिपुल बिहारिनि आसी। [3]
सरस नागरी नरहरि रसिक ललित जु चरन उपासी।। [4]
वृन्दावन की सहज माधुरी श्रीस्वामी परकासी। [5]
रूप अनूप निरखि छबि अद्भुत महामधुर मृदु हासी।। [6]

- श्री रूप सखी, रूप सखी जी की वाणी, सिद्धांत के पद (105)

भावार्थ :
 श्री रूप सखी श्री राधारनी से प्रार्थना कर रहे हैं कि आप मुझे रंगमहल की दासी कीजिये जहाँ मैं प्रिया प्रियतम की नित्य केलि लीला का दर्शन कर सकूँ और श्री हरिदासी (ललिता सखी) के संग में रहूँ। [1 & 2]
श्री विट्ठल विपुल देव जी एवं श्री बिहारिन देव जी के आश्रय से समस्त सुखों के सार स्वरूप इस नित्य विहार का सेवन प्राप्त करूँ । [3]
निज सखियों (सरस देव जी, श्री नागरी दास जी, श्री नरहरि देव जी, श्री रसिक देव जी एवं श्री ललित किशोरी देव जी) के चरणों की कृपा से श्री प्रिया प्रियतम की रस उपासना प्राप्त करूँ। [4]
जिसे श्री स्वामी हरिदास जी (ललिता अवतार) ने वृंदावन की अदभुत सहज माधुरी (अखंड नित्य विहार) को प्रकाशित किया है । [5]
श्री रूप सखी जी कहते हैं कि इस अनूप छवि को नित्य ही निरखता रहूँ, एवं इस महा मधुर  झांकी का दर्शन करता रहूँ । [6]