गेहे राधा वने राधा राधिका भोजने गतौ, रात्रौ राधा दिवा राधा राधैवाराध्यते मया ।
जिव्हा राधा श्रुतौ राधा नेत्रे राधा हृदिस्मृता, सर्वांगे व्यापिनी राधा राधैवाराध्यते मया ।
- ब्रह्मांड पुराण, राधास्तोत्रम् (1,2)
श्री कृष्ण कहते हैं कि घर में भी मुझे और वन में भी राधा का अनुभव होता है। कुछ खाता-पीता हूँ, कहीं चलता हूँ, दिन हो, रात हो, सदा राधा राधा ही मेरे रोम रोम में व्याप्त हैं। मेरी जिव्हा पर राधा, मेरे कानों में भी श्री राधा राधा की ही आवाज़ आती रहती है। मेरी आँख जहाँ उठती है वहीं राधा के दर्शन होते हैं। मेरे हृदय में भी राधा हैं। मैं राधा की ही भक्ति करता हूँ।
जिव्हा राधा श्रुतौ राधा नेत्रे राधा हृदिस्मृता, सर्वांगे व्यापिनी राधा राधैवाराध्यते मया ।
- ब्रह्मांड पुराण, राधास्तोत्रम् (1,2)
श्री कृष्ण कहते हैं कि घर में भी मुझे और वन में भी राधा का अनुभव होता है। कुछ खाता-पीता हूँ, कहीं चलता हूँ, दिन हो, रात हो, सदा राधा राधा ही मेरे रोम रोम में व्याप्त हैं। मेरी जिव्हा पर राधा, मेरे कानों में भी श्री राधा राधा की ही आवाज़ आती रहती है। मेरी आँख जहाँ उठती है वहीं राधा के दर्शन होते हैं। मेरे हृदय में भी राधा हैं। मैं राधा की ही भक्ति करता हूँ।

