प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी,
प्रेमही के रंग बोरी सोभा कही जात है। [1]
एक प्रान एक वैस एक ही सुभाव चाव,
एक बात दुहुँनि के मनहिं सुहात है॥ [2]
एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे,
एक एक बीरी दोऊ खंडि - खंडि खात हैं। [3]
एक रस एक प्रान एक दृष्टि 'हित ध्रुव',
हेरि हेरि बढ़ चौंप क्यों हूँ न अघात हैं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (16)
प्रेमही के रंग बोरी सोभा कही जात है। [1]
एक प्रान एक वैस एक ही सुभाव चाव,
एक बात दुहुँनि के मनहिं सुहात है॥ [2]
एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे,
एक एक बीरी दोऊ खंडि - खंडि खात हैं। [3]
एक रस एक प्रान एक दृष्टि 'हित ध्रुव',
हेरि हेरि बढ़ चौंप क्यों हूँ न अघात हैं॥ [4]
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (16)
गौरांगी नवल किशोरी एवं नीलघन सुंदर प्रियतम युगल की प्रेम रंग में सराबोर रसिक रँगीली जोड़ी की शोभा का भी कोई वर्णन हो सकता है? अर्थात् नहीं। उनकी शोभा अनिर्वचनीय है। [1]
युगल सम वयस् हैं, एक प्राण हैं। उनका स्वभाव एवं उत्साह भी सम है, तथा दोनों की रुचियाँ अभिन्न हैं। [2]
आज वे एक कुञ्ज में, एक शय्या पर, एक ही वस्त्र ओढ़े हुए, एक-एक ताम्बूल बीटिका लिये हुए, दंत-पंक्ति से खंडित करते हुए परस्पर आरोग रहे हैं। [3]
श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि ऐसे एक रस, एक प्राण, अभिन्न दृष्टि युगल, परस्पर छबि अवलोकन करते हुए प्रतिपल नवीन उत्साह को प्राप्त हो रहे हैं तथा कभी तृप्त नहीं होते। [4]

