(राग एकताल)
जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर । [1]
सदा सरबदा हम जिनके हैं , जनम जनम घरजाये चाकर ॥ [2]
चूक परै परिहरैं न कबहूँ , सबही भाँति दयाके आकर । [3]
जै श्रीभट्ट प्रगट त्रिभुवनमें , प्रनतनि पोषत परम सुधाकर ॥ [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (7)
जुगुलकिसोर हमारे ठाकुर । [1]
सदा सरबदा हम जिनके हैं , जनम जनम घरजाये चाकर ॥ [2]
चूक परै परिहरैं न कबहूँ , सबही भाँति दयाके आकर । [3]
जै श्रीभट्ट प्रगट त्रिभुवनमें , प्रनतनि पोषत परम सुधाकर ॥ [4]
- श्री भट्ट देवाचार्य, युगल शतक (7)
भावार्थ:
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहती हैं कि हमारे ठाकुर श्री युगल किशोर (श्री वृंदावन चन्द्र जू) हैं। [1]
हम उन श्यामा श्याम के ही हैं एवं सदा सर्वदा से चाकर (दास) हैं। [2]
वे दोनो ऐसे दयानिधि हैं, जो हमारी भूलों (गलतियों) पर कभी ध्यान नहीं देते। [3]
जो परम सुधाकर हमारे ठाकुर त्रिभुवन में जीवों का भरण पोषण करते है उनकी जय हो । [4]
श्री भट्ट देवाचार्य जी कहती हैं कि हमारे ठाकुर श्री युगल किशोर (श्री वृंदावन चन्द्र जू) हैं। [1]
हम उन श्यामा श्याम के ही हैं एवं सदा सर्वदा से चाकर (दास) हैं। [2]
वे दोनो ऐसे दयानिधि हैं, जो हमारी भूलों (गलतियों) पर कभी ध्यान नहीं देते। [3]
जो परम सुधाकर हमारे ठाकुर त्रिभुवन में जीवों का भरण पोषण करते है उनकी जय हो । [4]

