किंवा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (216)

किंवा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (216)

किंवा नस्तैः सुशास्त्रैः किमथ तदुदितैर्वत्त् र्मभिः सद्गगृहीतै-
र्यत्रास्ति प्रेम-मूर्तेर्नहि महिम-सुधा नापि भावस्तदीयः ।
किं वा वैकुण्ठ लक्ष्म्याप्यहह परमया यत्र मे नास्ति राधा,
किन्त्वाशाप्यस्तु वृन्दावन भुवि मधुरा कोटि जन्मान्तरेपि ॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (216)

जिनमें प्रेम-मूर्ति श्रीराधा की महिमा-सुधा एवं उनके भाव का वर्णन नहीं है उन सुशास्त्र समूहों से अथवा उन शास्त्र-विहित, साधुजन, उनके द्वारा गृहीत मार्ग-समूहों से भी हमको क्या प्रयोजन है अर्थात् हमारे लिए उनका संग उचित नहीं। अहा ! जहाँ हमारी श्रीराधा नहीं है उस वैकुण्ठ धाम से ही हमको क्या प्रयोजन ? किन्तु कोटि जन्मान्तरों में भी श्रीवृन्दावन-भूमि के प्रति हमारी मधुर आशा बनी रहे, यही वाञ्च्छा है।