हैं हम रसिक अनन्य प्रिया पिय कुंज महल के बासी । [1]
नई नई केलि बिलोकें छिन छिन रति विपरीत उपासी ॥ [2]
बीरी बसन सुगंध आरसी रुख लै करत खवासी । [3]
देत प्रसाद प्रेम सों हँसि हँसि कहि कहि भगवत दासी ॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.6)
भावार्थ :
श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान केलि लीलाओं का दर्शन होता है। [1 & 2]
जहां सहचारियां प्रिया प्रियतम की पान, वस्त्रों, सुगंध इत्रों, दर्पण इत्याद से खवासी (सेवा) कर रही हैं । [3]
श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं कि प्रिया प्रियतम उन्हें (सहचरियों को) आनंद मग्न हो कर दर्शन एवं रस प्रसाद रूप से दे रहे हैं। [4]
नई नई केलि बिलोकें छिन छिन रति विपरीत उपासी ॥ [2]
बीरी बसन सुगंध आरसी रुख लै करत खवासी । [3]
देत प्रसाद प्रेम सों हँसि हँसि कहि कहि भगवत दासी ॥ [4]
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (9.6)
भावार्थ :
श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं, कि हम अनन्य रसिक (युगल सरकार के अनन्य) कुंजमहल के वासी हैं, जहां हमें प्रिया प्रियतम की नित्य ही नवायमान केलि लीलाओं का दर्शन होता है। [1 & 2]
जहां सहचारियां प्रिया प्रियतम की पान, वस्त्रों, सुगंध इत्रों, दर्पण इत्याद से खवासी (सेवा) कर रही हैं । [3]
श्री भगवत रसिक देव जी कह रहे हैं कि प्रिया प्रियतम उन्हें (सहचरियों को) आनंद मग्न हो कर दर्शन एवं रस प्रसाद रूप से दे रहे हैं। [4]

