ऐश्वर्यं परमंच वेत्ति न मनाड् नान्यंच कंचिद्रसं।
न स्थाने परतः कदा त्वनुगतं नो वा कुतोऽप्यागतम्।।
कैशोरादपरं वयो न हि कदाप्यासादयन्न क्षणं
क्रीड़ातो विरतं तदेकमिथुनं वृन्दावने नन्दति।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.9)
परम ऐश्वर्य को बिन्दुमात्र भी नहीं जानती, अन्य किसी रस से परिचित नहीं, अन्यत्र कहीं जाती नहीं- आती नहीं, किशोर अवस्था के बिना और अवस्था नहीं तथ एक क्षण भी बिना क्रीड़ा के नहीं रह सकती, ऐसी एक अनिर्वचनीय जोड़ी श्रीवृन्दावन में आनन्द ले रही है।।
न स्थाने परतः कदा त्वनुगतं नो वा कुतोऽप्यागतम्।।
कैशोरादपरं वयो न हि कदाप्यासादयन्न क्षणं
क्रीड़ातो विरतं तदेकमिथुनं वृन्दावने नन्दति।।
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (6.9)
परम ऐश्वर्य को बिन्दुमात्र भी नहीं जानती, अन्य किसी रस से परिचित नहीं, अन्यत्र कहीं जाती नहीं- आती नहीं, किशोर अवस्था के बिना और अवस्था नहीं तथ एक क्षण भी बिना क्रीड़ा के नहीं रह सकती, ऐसी एक अनिर्वचनीय जोड़ी श्रीवृन्दावन में आनन्द ले रही है।।

