तो पद - पंकज को सदा - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (4)

तो पद - पंकज को सदा - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (4)

(दोहा)
तो पद-पंकज को सदा, रहौं जु मधुकर होय ।
मन बच क्रम मेरे न कछु, और कामना कोय ॥

(पद)
और कामना मोहिं न कोई ।
मन वच क्रम करि रहों निरंतर तुव पद-पंकज मधुकर होई ।। [1]
अहु बलि जाऊँ विहारिनि मेरी जीवनि निज जिय जानउ जोई ।
श्रीहरिप्रिया सहज सबही कैं अंतरगति की समझति सोई ॥ [2]

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (4)

(दोहा)
हे स्वामिनीजी! मेरी तो एकमात्र यही अभिलाषा है कि मैं सदैव आपके इन चरण-कमलों का भ्रमर बनकर रहूँ। मन, वाणी और कर्म से इसके अतिरिक्त मेरी अन्य कोई कामना नहीं है।

(पद)
मेरी और कोई कामना नहीं है, केवल इतनी ही वाञ्छा है, कि मन वचन कम से निरन्तर आपके इन चरणार विन्दों का मधुकर होकर के रहूँ । [1]

मेरी प्राण जीवन स्वामिनी जू ! हे मेरी विहारिणी ! मैं आप पर बलिहारी जाता हूँ। एक मात्र आपके ये चरणारविन्द ही मेरे जीवन स्वरूप हैं । हे श्रीहरिप्रिया - प्यारीजू आप सबके अन्तः करण की जानने वाली हो । इसलिये इस समय मेरे हृदय में जो भाव हैं उसे आप भली भांति जानती हो । [2]