मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)

मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)

मानुष कौ तन पाइ भजौ ब्रजनाथ कौं । [1]
दर्बी लैकें मूढ़ जरावत हाथ कौं।। [2]
(जय श्री) हित हरिवंश प्रपंच विषय रस - मोह के। [3]
(हरि हाँ) बिनु कंचन क्यों चलैं पचीसा लोह के ।। [4]

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (09)

व्याख्याः -
मनुष्य का शरीर पाकर ब्रजनाथ का भजन करो। [1]
अरे मूढ़, तू कलछी के समान मनुष्य शरीर पाकर भी संसार की अग्नि में अपने हाथ को जला रहा है। [2]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि संसार के सम्पूर्ण विषयों के रस मोह जनित हैं। [3]
ये सब लोहे के सिक्के के समान हैं और तू यह बता कि भगवद् प्रेम रूपी सुवर्ण के बिना ये खोटे सिक्के कैसे चलेंगे ? [4]