(राग बसंत)
नवल वृन्दावन नवल बसन्त। [1]
नव द्रुम बेलि केलि नव कुंजनि नवल कामिनी कंत। [2]
नव अलि अलक झलक नव कोकिल नव सुर मिलि बिलसंत। [3]
नव रस रसिक बिहारिनिदासी कैं नव आनँदहिं न अंत।। [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के पद (122)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, श्री वृंदावन धाम नित्य नवीन है एवं नवीन ही यहाँ बसंत है। [1]
जहां नव-नव द्रुम, लता-पताएं, बेल, कुंज आदि में प्रिया-प्रियतम नई-नई केलि लीलाएं करते हैं। [2]
जहां सखियाँ भी नित्य नवीन झलक पाती हैं, एवं कोयल नए-नए राग सुर का गान कर रही हैं जिसे सुन कर प्रिया प्रियतम विभोर हो रहे हैं तथा उनकी (प्रिया-प्रियतम) की सेवा में तल्लीन हैं। [3]
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नवीन वृन्दावन है, नवीन बसंत है, नित्य नवीन युगल वृन्दावन रस है, और अनंत काल तक इसका अंत नहीं है। [4]
नवल वृन्दावन नवल बसन्त। [1]
नव द्रुम बेलि केलि नव कुंजनि नवल कामिनी कंत। [2]
नव अलि अलक झलक नव कोकिल नव सुर मिलि बिलसंत। [3]
नव रस रसिक बिहारिनिदासी कैं नव आनँदहिं न अंत।। [4]
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, रस के पद (122)
श्री बिहारिन देव जी कहते हैं, श्री वृंदावन धाम नित्य नवीन है एवं नवीन ही यहाँ बसंत है। [1]
जहां नव-नव द्रुम, लता-पताएं, बेल, कुंज आदि में प्रिया-प्रियतम नई-नई केलि लीलाएं करते हैं। [2]
जहां सखियाँ भी नित्य नवीन झलक पाती हैं, एवं कोयल नए-नए राग सुर का गान कर रही हैं जिसे सुन कर प्रिया प्रियतम विभोर हो रहे हैं तथा उनकी (प्रिया-प्रियतम) की सेवा में तल्लीन हैं। [3]
श्री बिहारिन देव जी के शब्दों में नित्य ही नवीन वृन्दावन है, नवीन बसंत है, नित्य नवीन युगल वृन्दावन रस है, और अनंत काल तक इसका अंत नहीं है। [4]

