नवरस नित्य बिहार में नागर जानत नित्त - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (7)

नवरस नित्य बिहार में नागर जानत नित्त - श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (7)

नवरस नित्य बिहार में, नागर जानत नित्त।
भगवत रसिक अनन्य बर, सेवत मन बुद्धि चित्त॥

- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक जी की वाणी, अनन्यरसिकभरण ग्रंथ 1 (7)

नित्य विहार के नव रस को तो एक मात्र श्री लाल जी ही जानते हैं, तभी तो वह अनन्य बनकर अपने मन, बुद्धि एवं चित्त से एक मात्र नित्य विहार का ही सेवन करते हैं।