वृन्दाविपुन रसिक रजधानी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (135)

वृन्दाविपुन रसिक रजधानी - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (135)

वृन्दाविपुन रसिक रजधानी । [1]
राजा रसिकविहारी सुन्दर सुन्दर रसिकविहारनि रानी ॥ [2]
ललितादिक ढिग रसिक सहचरी जुगलरूप मदपानी । [3]
रसिक टहलनी वृन्दादेवी रचना रुचिर निकुंज रवानी ॥ [4]
जमुना रसिक रसिक द्रुमवेली रसिक भूमि सुखदानी । [5]
इहाँ रसिक चर थिर नागरिया रसिकहिं रसिक सबैं गुनगानी ॥ [6]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (135)

श्री वृन्दावन धाम (वृंदाविपिन) रसिकों की राजधानी है। [1]
जहाँ के राजा भी श्री रसिकबिहारी जी तथा रानी भी श्री रसिक बिहारिणी जी (राधा रानी) हैं। [2]
जहाँ श्री ललिता जी आदि सखियाँ भी रसिक ही हैं जो नित्य ही युगल रस एवं सेवा में उन्मत्त रहती हैं। [3]
वृंदावन की रचना एवं युगल की सेवा के सारे कार्य भी जो सखी करती हैं, वह वृंदादेवी भी रसिक हैं। [4]
यहाँ यमुना जी भी रसिक हैं, यहाँ के वृक्ष, बेल इत्यादि भी रसिक हैं, वृंदावन धाम तो एकमात्र रसिकों की सुखदानी भूमि है। [5]
श्री नागरीदास जी वृंदावन भूमि का गुणगान करके कह रहे हैं कि यह ऐसी दिव्य एवं वंदनीय भूमि है जहां के चर एवं अचर प्राणी (जड़ एवं चेतन) सब रसिक ही रसिक हैं। [6]