बड़ौ मन्द अरविन्द सुत - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (13)

बड़ौ मन्द अरविन्द सुत - श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (13)

बड़ौ मन्द अरविन्द सुत, जिहि न प्रेम पहिचान।
पिय मुख देखत दृगन के, पलक लगे बिच आन॥
- श्री नंददास, श्री नंददास ग्रंथावली, विरह मंजरी (13)
 
सृष्टिकर्ता विधाता (अरविन्द-सुत) निश्चय ही प्रेम-तत्व की अनभिज्ञता के कारण उपहास के पात्र हैं; क्योंकि उन्होंने दर्शन के मध्य पलकों का व्यवधान उत्पन्न किया है। जब अनुरागी नेत्र श्री कृष्ण के मुखारविन्द की माधुरी का पान करते हैं, तब पलकों का निपात एक महान अंतराल जान पड़ता है। रसिकों के लिए पलक झपकने का वह क्षण भी युगों के समान दुष्कर और असह्य है।