लगै जो श्रीवृन्दावन कौ रंग - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1374)

लगै जो श्रीवृन्दावन कौ रंग - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1374)

(राग बिलावल)
लगै जो श्रीवृन्दावन कौ रंग। [1]
देह अभिमान सवै मिटि जावै अरु विषयन कौ संग।। [2]
सखि भाव सहज होय सजनी पुरुष भाव होय भंग। [3]
श्री राधा वर सेवत सुमिरत उपजत लहर तरंग।। [4]
मन को मैल सबै छुट जई है मन सा होए अपंग। [5]
‘परमानंद’ स्वामी गुन गावत, मिट गए कोटि अनंग ।। [6]

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1374)

प्रस्तुत पद में श्री वृंदावन धाम की महिमा का गुणगान बहुत सुंदर शब्दों में रसिक श्री परमानंद दास जी ने किया है ।
वह कहते हैं कि जब से वृंदावन का रंग चढ़ा है, समस्त देह अभिमान तो मिटा ही और विषयों का संग भी समाप्त हो गया। [1 & 2]
सजनी, वृंदावन का ऐसा अलौकिक प्रभाव है कि सहज ही सखि भाव उत्पन्न हो गया और पुरुष भाव भंग हो गया। [3]
इतना ही नहीं वृंदावन धाम की कृपा से श्री राधा कृष्ण का सहज सुमिरन करके हृदय में रस की लहरें एवं तरंगे उतपन्न हो गयी। [4]
मन का मैल स्वयं ही छूट गया एवं मानो मन पंगु हो गया। [5]
श्री परमानंद दास जी कहते हैं कि उनके स्वामी (श्री राधा कृष्ण) का गुन गान करके मानो कोटि कोटि कामदेव का सौंदर्य भी हेय प्रतीत हो रहा है। [6]