निकसि कुंज ठाडे भये - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.3)

निकसि कुंज ठाडे भये - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.3)

निकसि कुंज ठाडे भये, भुजा परस्पर अंस।
श्रीराधावल्लभ मुख कमल, निरखि नैन हरिवंश॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (24.3)

श्री हित हरिवंश महाप्रभु कहते हैं कि प्रिया-प्रीतम निकुञ्ज से बाहर निकलकर खड़े हुए हैं, और दोनों ने परस्पर एक-दूसरे के कंधों पर अपनी भुजाएँ रखी हुई हैं। श्री हित हरिवंश जी अपने नेत्रों से श्री राधावल्लभ लाल के उस परम सुंदर मुख-कमल की छवि को एकटक निहार रहे हैं।