(राग देवगंधार)
तिहारो सुख जौ मन मैं आवै।
तौ मेरे भागनि की महिमा को कबि बरनि बतावै। [1]
जमुनातट कुंजनि की सोभा लखि आनंदघन छावै।
श्री वृंदावन राधा मनोहर बसिबोई नित भावै॥ [2]
- श्री आनन्दघन जी, पदावली (338)
भावार्थ:-
वृंदावन के सुख का वर्णन करते हए श्री आनंदघन जी कहते हैं कि जैसे ही वृंदावन के सुख (रस) हृदय में आता है तो अपने भाग्य की महिमा का वर्णन करना असम्भव सा लगता है । [1]
श्री यमुना जी के तट पर कुंजों की शोभा मानो जैसे आंनद रुपी घन छा रहे हों।
श्री आनंदघन जी कहते हैं कि मुझे तो केवल श्री वृन्दावन में श्रीराधाकृष्ण की नित लीलाओ को निहारते हुए वहीं (वृन्दावन) बसना सुहाता है। [2]
तिहारो सुख जौ मन मैं आवै।
तौ मेरे भागनि की महिमा को कबि बरनि बतावै। [1]
जमुनातट कुंजनि की सोभा लखि आनंदघन छावै।
श्री वृंदावन राधा मनोहर बसिबोई नित भावै॥ [2]
- श्री आनन्दघन जी, पदावली (338)
भावार्थ:-
वृंदावन के सुख का वर्णन करते हए श्री आनंदघन जी कहते हैं कि जैसे ही वृंदावन के सुख (रस) हृदय में आता है तो अपने भाग्य की महिमा का वर्णन करना असम्भव सा लगता है । [1]
श्री यमुना जी के तट पर कुंजों की शोभा मानो जैसे आंनद रुपी घन छा रहे हों।
श्री आनंदघन जी कहते हैं कि मुझे तो केवल श्री वृन्दावन में श्रीराधाकृष्ण की नित लीलाओ को निहारते हुए वहीं (वृन्दावन) बसना सुहाता है। [2]

