अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा, विराजमानामनुरूप-सौभगाम्।
सखीसहस्रै: परिसेवितां सदा, स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्।।
- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (5)
अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी श्री राधा को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।
सखीसहस्रै: परिसेवितां सदा, स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्।।
- जगद्गुरु श्री निम्बार्काचार्य, श्री वेदांत दश्श्लोकी (5)
अनुरूप सौभगारूप से कृष्ण के वामांग में आनन्दपूर्वक विराजमान, समस्त मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली बृषभानुजी श्री राधा को नमस्कार करता हूँ, जो सहस्रों सखियों द्वारा परिसेवित हैं।

