रोम रोम जो रसना होती तऊ तेरे गुन न बखाने जात - स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (40)

रोम रोम जो रसना होती तऊ तेरे गुन न बखाने जात - स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (40)

(राग केदारौ)
रोम रोम जो रसना होती तऊ तेरे गुन न बखाने जात । [1]
कहा कहौं एक जीभ सखी री बात की बात बात ॥ [2]
भानु स्त्रमित और ससि हु स्त्रमितभये और जुवति जात । [3]
श्रीहरिदास के स्वामी स्याम कहत री प्यारी
तू राखति प्रान जात ॥ [4]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (40)

लाड़िली लाल सुन्दर गुलाबों की पत्तियों की सेज पर शोभायमान हो रहे हैं । महा आनन्द रस में पगे हुए हैं । प्यारे प्रियतमा की कृपा में भींगे हुए रोम रोम से प्रेमरस पी रहे हैं । प्रिय कह रहे हैं- मेरे रोम-रोम में जिह्वा ( रसना ) होती तो भी वह आपके गुणों के बखान करने में असमर्थ रहती। [1]
क्या कहूँ, मात्र एक जीभ है और आपके गुणों को एक जीभ से कथन की बात है। मैं तो हार चुका हूँ , कुछ भी कहा नहीं जाता । [2]
आपके गुणों का वर्णन करते हुए सूर्य, चंद्र, एवं नव युवती समूह सब ही श्रमित हो गए एवं थकित हो कर मानो हार मान गए हैं । [3]
श्री हरिदासी के स्वामी श्याम, श्यामा जी से कह रहे हैं - मैं आपके कुंज रूपी तन में सदा विहार करता हूँ । आप मेरे जाते हए प्राणों की रक्षा करती हैं । आप अपनी कृपा से पोषण न करतीं तो मेरे प्राण कब के निकल जाते । [4]