कल न पर छिन बिन लखे, तो मुख चंद्र प्रभाव - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (3)

कल न पर छिन बिन लखे, तो मुख चंद्र प्रभाव - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (3)

(दोहा)
कल न पर छिन बिन लखे, तो मुख चंद्र प्रभाव ।
अहो प्रिया कछु परिरह्यो, मेरो सहज सुभाव ॥

(पद)
सहज सुभाव रह्यो परि मेरौ ।
कल न परें छिन अवलोके विन बदनचन्द्र प्यारी जू तेरौ ॥
पलकन ओट होत सन तें मोहिं कोटत आय अटूट अँधेरौ ।
श्रीहरिप्रिया जोरि करसों कर करत बीनती ह्वै कें चेरौ ॥ ३ ॥

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सहज सुख (3)

श्रीलाल जू श्री प्रिया जू से विनय पूर्वक कहते हैं :-

(दोहा)
हे प्रियाजू! मेरा स्वभाव अब कुछ ऐसा सहज हो गया है कि आपके मुख-चन्द्र की दिव्य आभा का एक क्षण के लिये भी दर्शन किए बिना मुझे चैन नहीं मिलता।

(पद)
हे प्रियाजू ! मेरा कुछ ऐसा सहज स्वभाव पड़ गया है कि आपके मुख चन्द्र की प्रभा को एक क्षण के लिये भी देखे बिना मुझे चैन नहीं पड़ता। पलक की ओट होने मात्र से ही मेरे लिये ऐसा हो जाता है मानों घनीभूत अन्धकार ने मुझे घेर लिया हो । श्रीहरि, श्रीप्रिया जू से सेवक की नांई (तरह) होकर हाथ जोड़कर विनती करते हैं ।